कारण बनी द्रोपदी खुद
कौरव विनाश की मूल पात्र ।
तुम बनी मेरे लिए प्रिय ।
खुद उदधोषिका, प्रेम मिलन का ।
एक हीं फूल तोड़ने से
सूना सूना सा लगा सब वाटिका ।
मेहेक वाटिका में अब कुछ नहीं रहा ।
भवंरा सब उड कर, दुसरी जगह चला ।
जब फूल समझकर तुझे तोड़ा
हरा वृक्ष और पर्वत रोने लगा ।
आंसूवों का धार नदि में मिला
तुझे पीछा करते इंद्रेणी पहुचा ।
तेरी आगमन का संदेश पवन ने लाया
खुशबू मेहेका मेरे आगन में ।
वृक्षलता और प्रकृति सब में
सुलगा यौवन, तेरी मादकता से ।
वृक्षलता के सब रंगिन पुष्प
प्रतिफल बना हम्हारा प्रेम का ।
इद्र धनुष बना स्वयंवर माला
ये कैसा अदभूत संयोग ।
रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
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