सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (96- 100) Poem by Tulsi Shrestha

सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (96- 100)

तू साया मेरे देह का
दो आकृति, एक प्रतिबिम्ब ।
तू स्वर मेरे शब्दों का
दो आवाज एक प्रतिध्वनि ।

चंचल नयनों ने बिजुली गिराया
दिल घायल हो के होश गुमाया ।
पता ना चला क्या कुछ हुआ
तेरी चुम्बन ने, फिर चेत जगाया ।

प्रीत लगाई रात ने यौवन से
मदहोश हो के सूरज उगना भूला।
मेरे आगोस तू और मेहेक गई
मधुमास की रात ज्यादा लंबी हो गई ।

सागर मंथन खूब हुंआ
प्रणय कुण्ड में ज्वार उबला ।
हिम शिखर से हिम पिघल कर गिरा ।
सागर तब निश्चल और शांत हुआ ।

रिश्तों की दोर से बढ़ा हुआ जीवन
कितना पवित्र, कितना निर्मल ।
आगोस में बढ़ा हुआ दो गरम यौवन को
हार मे भी जित आभास मिला, इनके मन को ।

रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
@ Copyright Reserved

Friday, November 20, 2020
Topic(s) of this poem: heart,love,lust,night,sea
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success