यह कैसा आ गया है मंजर
भय का माहौल है सीने के अंदर
घर में विचित्र सन्नाटा है
अगर निकलो बाहर तो बाधा है
धरती ख़ामोश पथराई है
घनघोर उदासी छायी है
जीव जंतु पक्षी पेड़ सब पुछ रहे
मानव क्यूँ हमें तुम भूल गए
कब मनुष्य जिया ऐसा अकेला था
चारों तरफ़ उसके तो मेला था
भाई से भाई दूर हुए
नियति के आगे मजबूर हुए
गलियाँ सूनी, सड़कें सुनी
क़स्बे शहर वीरान पड़े
है जीवन गति ठहरा हारा
मानव मानव से दूर खड़े
लेकिन है ये अंत नहीं
थोड़ी सी विवशता ही सही
यह रात लम्बी है काली है
मत भूलो आगे सूरज की लाली है
माना भीषण यह रण होगा
लेकिन सोचो वह क्या क्षण होगा
शंख नाद धरा पर गूँजेगा
मृत्यु पर जीवन का जय होगा
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