एक आदमी हर सुबह
समय पर काम पर जाता था,
टैक्स भी देता था,
नियम भी निभाता था।
उसे सिखाया गया था—
'सिस्टम पर भरोसा रखना, '
'ईमानदारी से चलोगे,
तो मंज़िल तक पहुँचोगे अपना।'
और उसने वही किया।
लाइन में खड़ा रहा।
अपनी बारी का इंतज़ार किया।
नियमों का सम्मान किया।
फिर धीरे-धीरे उसने देखा—
कहीं काम पैसे से तेज़ हुआ,
कहीं पहचान से रास्ता खुला,
कहीं नियम बदल गए,
कहीं भरोसा झुक गया।
एक दिन उसे समझ आया—
सबसे बड़ी चोरी
पैसे की नहीं थी।
सबसे बड़ी चोरी
भरोसे की थी।
सवाल ये नहीं कि
भ्रष्टाचार मौजूद है,
सवाल ये है कि
वो इतना सामान्य क्यों है?
सवाल ये नहीं कि
गलत लोग जीत क्यों जाते हैं,
सवाल ये है कि
सही लोग थक क्यों जाते हैं?
जब रिश्वत खबर नहीं बनती,
जब बेईमानी आदत बन जाती है,
तब नुकसान सिर्फ़ खज़ाने का नहीं होता,
पूरे समाज का होता है।
क्योंकि सड़कें फिर बन सकती हैं,
इमारतें फिर खड़ी हो सकती हैं,
लेकिन टूटा हुआ विश्वास
बहुत मुश्किल से जुड़ता है।
हम चमत्कार नहीं माँगते,
हम बस इतना पूछते हैं—
अगर नियम सबके लिए बराबर हैं,
तो भरोसा इतना कमज़ोर क्यों है?
क्योंकि किसी देश की असली पूँजी
सोना या पैसा नहीं होती,
उसकी असली पूँजी
जनता का विश्वास होता है।
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