पाँच साल तक
गली वही रहती है,
सड़क वही टूटी रहती है,
नौकरी वही अधूरी रहती है।
फिर अचानक चुनाव आता है,
और पूरा माहौल बदल जाता है।
कोई धर्म बचाने निकलता है,
कोई सेक्युलरिज़्म बचाने,
कोई इतिहास याद दिलाता है,
कोई भविष्य दिखाने।
कल तक जो स्कूल नहीं दिखे,
आज मंदिर-मस्जिद दिखते हैं,
जो अस्पतालों पर चुप रहते थे,
वो पहचानों पर लिखते हैं।
बेटा नौकरी ढूँढ रहा है,
बाप महँगाई से लड़ रहा है,
माँ अस्पताल की लाइन में है,
पर टीवी किसी और बात पर अड़ा है।
हिंदू इधर,
मुस्लिम उधर,
जाति कहीं,
वर्ग कहीं,
और असली मुद्दे
फिर खो गए वहीं।
सवाल ये नहीं कि
धर्म किसका बड़ा है,
सवाल ये है कि
भविष्य किसका खड़ा है?
सवाल ये नहीं कि
कौन किससे डरता है,
सवाल ये है कि
देश पीछे क्यों पड़ता है?
हर चुनाव में
दुश्मन बदल जाता है,
पर बेरोज़गारी,
शिक्षा और इलाज
वहीं खड़ा रह जाता है।
हम धर्म से नफ़रत नहीं करते,
हम राजनीति से सवाल करते हैं—
अगर विकास ही लक्ष्य है,
तो मुद्दे हर बार बदल क्यों जाते हैं?
वोट बाँटकर चुनाव जीते जा सकते हैं,
लेकिन देश नहीं बनाया जाता।
क्योंकि कुर्सियाँ नारों से मिल जाती हैं—
मगर राष्ट्र समाधान से बनाया जाता है।
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