ईमानदारी की कीमत Poem by AAHAN VARMA

ईमानदारी की कीमत

बचपन में सिखाया था,

झूठ मत बोलना,

किसी का हक़ मत छीनना,

और ईमानदारी से जीना।

बेटे ने वही किया,

नकल नहीं की,

रिश्वत नहीं दी,

गलत रास्ता नहीं लिया।

वो लाइन में खड़ा रहा,

नियमों का सम्मान किया,

सोचा था मेहनत काफी होगी,

बस इतना विश्वास किया।

फिर उसने देखा—

कोई शॉर्टकट से आगे निकल गया,

कोई पहचान से जीत गया,

कोई पैसे से रास्ता बदल गया।

और वो वहीं खड़ा रहा,

अपने उसूलों के साथ,

सोचता रहा—

क्या मैं गलत रास्ते पर था?

सवाल ये नहीं कि

ईमानदारी मुश्किल क्यों है,

सवाल ये है कि

बेईमानी आसान क्यों है?

सवाल ये नहीं कि

नियम बने हुए हैं,

सवाल ये है कि

सब पर लागू क्यों नहीं हैं?

जब गलत करने वाला

फ़ायदे में दिखता है,

तो सही करने वाला

अंदर ही अंदर टूटता है।

धीरे-धीरे लोग सीख जाते हैं—

कि नियम किताबों में अच्छे लगते हैं,

और यही सोच

समाज को खोखला करती है।

हम अमीरी नहीं माँगते,

हम विशेषाधिकार नहीं माँगते—

हम बस इतना पूछते हैं—

अगर ईमानदारी सही रास्ता है,

तो मंज़िल उस तक सबसे देर से क्यों पहुँचती है?

क्योंकि किसी देश की असली ताक़त

उसकी सेना या इमारतें नहीं होतीं,

उसकी ताक़त वो लोग होते हैं

जो सही काम करते हैं,

जब गलत काम आसान हो।

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