कोटा की खामोशी Poem by AAHAN VARMA

कोटा की खामोशी

एक बच्चा घर से निकला था,

आँखों में सपने भरकर,

माँ ने माथा चूमा था,

भविष्य उसके सिर पर रखकर।

बाप ने कहा था—

'बस थोड़ा और संघर्ष कर ले,

हमारी अधूरी जीत

तू पूरी कर ले।'

फिर शुरू हुई दौड़।

सुबह टेस्ट।

शाम टेस्ट।

रात टेस्ट।

और सपनों पर

एक और टेस्ट।

दोस्त धीरे-धीरे नंबर बन गए,

मुस्कानें रैंक बन गईं,

और ज़िंदगी की सारी बातें

बस प्रतिशत में सिमट गईं।

किसी ने नींद खो दी,

किसी ने बचपन,

किसी ने हँसना छोड़ दिया,

किसी ने अपना मन।

सवाल ये नहीं कि

बच्चे मेहनत क्यों करते हैं,

सवाल ये है कि

वो इतना डरकर क्यों पढ़ते हैं?

सवाल ये नहीं कि

सपने इतने बड़े क्यों हैं,

सवाल ये है कि

कंधे इतने छोटे क्यों हैं?

हर रिपोर्ट कार्ड के पीछे

एक कहानी छिपी होती है,

कुछ अंकों की नहीं,

कुछ टूटती हुई उम्मीदों की होती है।

हम सफलता के खिलाफ नहीं,

हम दबाव के खिलाफ हैं।

क्योंकि हर बच्चा मशीन नहीं,

एक इंसान है।

और जब एक बच्चा

अपने सपनों से हार जाता है—

तब सिर्फ़ एक छात्र नहीं,

पूरा समाज हार जाता है।

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