बचपन में पूछा जाता था,
'बड़े होकर क्या बनोगे? '
वो मुस्कुराकर कहता था—
'कुछ बड़ा करूँगा,
माँ-बाप का नाम रोशन करूँगा।'
फिर स्कूल आया,
कॉलेज आया,
डिग्री आई,
उम्मीदों का कारवाँ आया।
माँ ने कहा—
'बस अब मेहनत रंग लाएगी, '
बाप ने कहा—
'अब घर की किस्मत बदल जाएगी।'
वो फ़ॉर्म भरता गया,
परीक्षाएँ देता गया,
उम्र बढ़ती गई,
और इंतज़ार भी बढ़ता गया।
कहीं भर्ती अटक गई,
कहीं परीक्षा रद्द हुई,
कहीं सीटें कम थीं,
कहीं सूची ही बदल गई।
दोस्त नौकरी पर चले गए,
कुछ विदेश निकल गए,
कुछ सपनों के साथ लड़े,
कुछ थककर बिखर गए।
सवाल ये नहीं कि
युवा मेहनत नहीं कर रहे,
सवाल ये है कि
मौके कहाँ खो रहे?
सवाल ये नहीं कि
सपने छोटे हैं,
सवाल ये है कि
रास्ते इतने टूटे क्यों हैं?
एक तरफ़ भाषणों में
युवा देश की ताकत हैं,
दूसरी तरफ़ वही युवा
कतारों में खड़े हैं।
हम मुफ़्त की मंज़िल नहीं माँगते,
हम बस एक मौका माँगते हैं—
अगर मेहनत ही सफलता की चाबी है,
तो इतने ताले क्यों हैं?
क्योंकि बेरोज़गारी
सिर्फ़ नौकरी की कमी नहीं होती,
वो धीरे-धीरे
उम्मीद की मौत होती है।
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