सरकारी स्कूल का सवाल Poem by AAHAN VARMA

सरकारी स्कूल का सवाल

एक छोटा सा बच्चा था,

कंधों पर बस्ता लटकाए,

हर सुबह उम्मीद लेकर

स्कूल तक चला जाए।

माँ ने कहा था—

'पढ़ लेना बेटा,

यहीं से दुनिया बदलती है,

यहीं से किस्मत पलटती है।'

वो पहुँचा तो देखा—

दीवारें पुरानी थीं,

किताबें थकी हुई थीं,

और कुर्सियाँ आधी थीं।

कहीं शिक्षक कम थे,

कहीं कमरे कम थे,

कहीं इंटरनेट नहीं था,

कहीं सपने कम थे।

फिर लोग पूछते हैं—

कोचिंग इतनी बड़ी क्यों है?

सवाल ये है—

स्कूल इतने छोटे क्यों हैं?

सवाल ये नहीं कि

बच्चे पीछे क्यों रह जाते हैं,

सवाल ये है कि

मौके पहले ही क्यों बँट जाते हैं?

सवाल ये नहीं कि

प्रतिभा कहाँ गई,

सवाल ये है कि

सुविधा कहाँ गई?

एक शहर का बच्चा

दौड़ शुरू होने से पहले आगे है,

एक गाँव का बच्चा

अभी जूते ही बाँध रहा है।

हम चमत्कार नहीं माँगते,

हम बराबरी का रास्ता माँगते हैं—

अगर शिक्षा अधिकार है,

तो हर स्कूल एक जैसा क्यों नहीं है?

क्योंकि किसी देश का भविष्य

संसद में नहीं बैठता,

वो हर सुबह

एक सरकारी स्कूल में बैठता है।

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