बचपन में हमें सिखाया था,
'गलत दिखे तो सवाल करो, '
सच की राह पर चलना हो,
तो बेखौफ़ होकर बात करो।
एक छात्र ने पूछा—
'ये वादा पूरा कब होगा? '
एक पत्रकार ने लिखा—
'ये सच छुपाया क्यों गया? '
एक नागरिक ने जानना चाहा—
'जवाब आखिर कौन देगा? '
मगर सवालों से पहले ही
उसका नाम तय कर दिया गया।
'देशद्रोही! '
'एंटी-नेशनल! '
'तुम्हारी नीयत साफ़ नहीं! '
जवाब कोई देता नहीं,
पर ठप्पों की कमी नहीं।
ना उसने नफ़रत फैलाई,
ना देश को बदनाम किया,
उसने तो बस इतना पूछा—
'जो गलत है, उसे ठीक क्यों नहीं किया? '
एक रिपोर्टर सच लिखता है,
फिर वही कटघरे में आता है,
जो पर्दे के पीछे झाँक ले,
वो ही निशाने पर जाता है।
एक व्हिसलब्लोअर सच बोले,
तो दुश्मन सा दिखाया जाता है,
जो भ्रष्टाचार का नाम ले,
उसे चुप कराया जाता है।
सवाल ये नहीं कि
लोग सवाल क्यों करते हैं,
सवाल ये है कि
कुछ लोग सवालों से डरते क्यों हैं?
अगर आलोचना नफ़रत है,
तो सुधार कहाँ से आएगा?
अगर हर सवाल गुनाह है,
तो सच कौन बताएगा?
हम नफ़रत से नहीं,
उम्मीद से सवाल करते हैं,
क्योंकि जो देश से प्यार करते हैं,
वो ही जवाब माँगते हैं।
और जिस दिन सवाल खतरनाक हो जाएँ,
और खामोशी इनाम हो जाए—
उस दिन सिर्फ़ आवाज़ नहीं मरती,
लोकतंत्र भी मर जाए।
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