सपनों की प्रयोगशाला Poem by AAHAN VARMA

सपनों की प्रयोगशाला

एक बच्चा बचपन में

आसमान को देखता था,

तारों के बीच कहीं

अपना नाम खोजता था।

खिलौनों से नहीं,

सवालों से खेलता था,

'ये कैसे होता है? '

वो हर चीज़ से पूछता था।

माँ मुस्कुराकर कहती—

'बड़ा होकर कुछ नया बनाना, '

वो सोचता था—

'दुनिया को कुछ नया सिखाना।'

फिर स्कूल आया,

कॉलेज आया,

डिग्री आई,

और संघर्ष भी साथ आया।

कहीं लैब छोटी थी,

कहीं संसाधन कम थे,

कहीं विचार तैयार थे,

पर मौके बहुत कम थे।

कुछ सपने विदेश चले गए,

कुछ बीच रास्ते रुक गए,

कुछ शोध कागज़ों में रह गए,

कुछ लोग ही टूट गए।

सवाल ये नहीं कि

प्रतिभा कहाँ है,

सवाल ये है कि

सहारा कहाँ है?

सवाल ये नहीं कि

युवा सपने क्यों देखते हैं,

सवाल ये है कि

उन सपनों को उड़ान कौन देता है?

एक वैज्ञानिक सिर्फ़ नौकरी नहीं करता,

वो भविष्य लिखता है,

एक शोध सिर्फ़ प्रयोग नहीं होता,

वो आने वाला कल बनाता है।

हम तुलना नहीं करते,

हम संभावना देखते हैं—

क्योंकि कमी दिमाग़ों में नहीं,

मौकों में देखते हैं।

अगर हर बच्चे में

कुछ नया बनाने की आग है,

तो फिर बताइए—

क्या हमारी प्रयोगशालाओं में

उस आग के लिए जगह है?

क्योंकि देश सिर्फ़ इतिहास से नहीं बढ़ता,

देश उन सपनों से बढ़ता है

जो अभी तक बनाए नहीं गए।

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