न्यूज़ या नॉइज़? Poem by AAHAN VARMA

न्यूज़ या नॉइज़?

रात को खाना खाते हुए,

पिता ने टीवी लगाया था,

सोचा था देश की खबर मिलेगी,

सच का चेहरा नज़र आएगा।

पर स्क्रीन पर फिर वही शोर था,

वही पुराना झगड़ा था,

कौन हिंदू, कौन मुस्लिम—

बस यही बड़ा मुद्दा था।

उधर स्कूल टूट रहे थे,

इधर नौकरियाँ कम थीं,

अस्पतालों में भीड़ खड़ी थी,

पर बहस कहीं और ही थी।

एक एंकर चिल्ला रहा था,

दूसरा भी गरजा था,

सच को बोलने की बारी आई—

तो समय पूरा हो चुका था।

सवाल ये नहीं कि

कौन बहस जीत गया,

सवाल ये है कि

सच फिर कहाँ हार गया?

हर रात शोर बिकता है,

हर रात गुस्सा बिकता है,

टीआरपी की इस मंडी में

सच सबसे सस्ता बिकता है।

स्क्रीन तो चमकती रहती है,

बहसें जलती रहती हैं,

पर सच किसी कोने में बैठा

अपनी बारी गिनता रहता है।

और धीरे-धीरे

देश सुनना छोड़ देता है,

क्योंकि शोर जितना बढ़ता है—

सच उतना छोटा होता है।

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