सच लिखने की सज़ा Poem by AAHAN VARMA

सच लिखने की सज़ा

एक पत्रकार निकला था,

बस सच की तलाश में,

ना कुर्सी चाहिए थी,

ना नाम इतिहास में।

घर वालों ने कहा था—

'सावधानी से रहना, '

उसने मुस्कुराकर बोला—

'बस सच ही तो कहना।'

फिर उसने कुछ सवाल पूछे,

कुछ फाइलें खोलीं,

कुछ छिपी हुई कहानियाँ

दुनिया के सामने बोलीं।

और अचानक माहौल बदला,

नज़रें बदल गईं,

जो सच कल खबर था,

वो आज खतरा बन गईं।

कुछ को धमकियाँ मिलीं,

कुछ पर मुकदमे हुए,

कुछ की आवाज़ दब गई,

कुछ हमेशा के लिए चुप हुए।

सवाल ये नहीं कि

सच इतना भारी क्यों है,

सवाल ये है कि

सच बोलना जोखिम क्यों है?

सवाल ये नहीं कि

लोग सवाल क्यों पूछते हैं,

सवाल ये है कि

जवाब देने से लोग क्यों बचते हैं?

एक कलम से इतना डर,

एक सवाल से इतनी घबराहट,

अगर सच कमज़ोर है—

तो फिर इतनी बेचैनी क्यों है?

हम दुश्मन नहीं ढूँढते,

हम जवाब ढूँढते हैं,

क्योंकि लोकतंत्र में

सवाल ही रास्ते खोलते हैं।

और जिस दिन सच बोलने से

लोग डरने लगेंगे—

उस दिन झूठ नहीं जीतेगा,

सिर्फ़ सन्नाटा जीत जाएगा।

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