सुबह पाँच बजे उठता था,
रात दो बजे सोता था,
एक रैंक के पीछे-पीछे
हर दिन खुद को खोता था।
माँ ने गहने गिरवी रखे,
बाप ने कर्ज़ उठाया था,
उसकी एक सीट के लिए
पूरा घर दाँव लगाया था।
हर टेस्ट में,
हर रैंक में,
बस एक ही सपना पलता था—
'इस बार सब बदल जाएगा...'
यही दिल को बहलाता था।
फिर एक दिन खबर आई—
एक और छात्र चला गया।
रिपोर्ट कार्ड बच गया,
पर बच्चा हार गया।
कोटा रोया,
होस्टल रोए,
कितने सपने बीच रास्ते खोए।
किसी ने नींद गंवाई,
किसी ने बचपन,
किसी ने हँसना छोड़ दिया
इस अंधी दौड़ के कारण।
सवाल ये नहीं कि
कितने नंबर आए,
सवाल ये है कि
कितने बच्चे बच पाए?
हर साल रैंक निकलती है,
हर साल टॉपर छपते हैं,
पर जो टूटकर बिखर गए—
उनके आँसू कौन पढ़ते हैं?
सिस्टम नंबर गिनता है,
रैंक गिनता है,
पर दिलों पर पड़े घाव
कौन गिनता है?
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