अस्पताल की लाइन Poem by AAHAN VARMA

अस्पताल की लाइन

सुबह से बुखार था,

माँ का शरीर काँप रहा था,

पर घर में चर्चा दवा की नहीं,

खर्चे की हो रहा था।

पिता ने जेब टटोली,

कुछ नोट गिने,

फिर चुपचाप अस्पताल की तरफ़

कदम बढ़े।

लाइन बहुत लंबी थी,

उम्मीद बहुत छोटी,

दर्द बहुत ज़्यादा था,

व्यवस्था थोड़ी-थोड़ी।

एक बिस्तर के लिए

दस लोग खड़े थे,

कुछ इलाज ढूँढ रहे थे,

कुछ सिर्फ़ सहारे पर खड़े थे।

माँ दर्द से कराह रही थी,

बेटा नंबर बुला रहा था,

और सिस्टम कहीं दूर बैठा

विकास का गीत सुना रहा था।

सवाल ये नहीं कि

बीमारी क्यों आती है,

सवाल ये है कि

इलाज इतना मुश्किल क्यों हो जाता है?

सवाल ये नहीं कि

अस्पताल मौजूद हैं,

सवाल ये है कि

सबके लिए पर्याप्त क्यों नहीं हैं?

किसी ने फीस भर दी,

किसी ने ज़मीन बेच दी,

किसी ने इलाज करा लिया,

किसी ने उम्मीद छोड़ दी।

अमीर के लिए बीमारी

एक बिल बन जाती है,

गरीब के लिए बीमारी

पूरी ज़िंदगी खा जाती है।

हम चमत्कार नहीं माँगते,

हम बस इतना पूछते हैं—

अगर स्वास्थ्य अधिकार है,

तो इलाज किस्मत क्यों बन जाता है?

क्योंकि बीमारी से कम,

लोग खर्चों से ज़्यादा डरते हैं।

और जिस देश में इलाज डर बन जाए—

वहाँ दर्द सिर्फ़ शरीर में नहीं होता।

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