न्याय का इंतज़ार Poem by AAHAN VARMA

न्याय का इंतज़ार

एक बेटी ने सपने देखे थे,

एक परिवार ने भरोसा रखा था,

सोचा था कानून जागेगा,

और सच का साथ देगा।

फिर साल बीत गए,

तारीख़ों पर तारीख़ें आईं,

अदालत के दरवाज़ों तक

थककर उम्मीदें पहुँच पाईं।

टीवी पर खबरें बदल गईं,

नेता बदल गए,

नारे बदल गए,

पर कुछ घाव वहीं रह गए।

आम आदमी पूछता है—

न्याय इतना धीमा क्यों है?

दर्द इतना गहरा क्यों है?

और इंतज़ार इतना लंबा क्यों है?

जब ताक़त साथ खड़ी हो,

तो रास्ते आसान लगते हैं,

जब कोई अकेला हो,

तो साल भी कम पड़ते हैं।

लोग अपराध से नहीं डरते,

अपराध तो हर समाज में होता है,

लोग तब डरते हैं

जब जवाबदेही खोती है।

सवाल ये नहीं कि

कानून मौजूद है या नहीं,

सवाल ये है कि

न्याय समय पर मिलता है या नहीं।

सवाल ये नहीं कि

अपराध क्यों हुआ,

सवाल ये है कि

जवाबदेही कहाँ गई?

क्योंकि लोगों का भरोसा

अपराध से नहीं टूटता,

भरोसा तब टूटता है—

जब जवाब देर से आता है।

हम बदला नहीं माँगते,

हम व्यवस्था पर विश्वास माँगते हैं—

क्योंकि न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए,

न्याय दिखना भी चाहिए।

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