एक दिन
नारे बदल जाएँगे,
चेहरे बदल जाएँगे,
वादे बदल जाएँगे।
लेकिन एक सवाल
फिर भी बच जाएगा—
क्या जनता की आवाज़
ज़िंदा रह पाएगी?
एक छात्र पूछेगा—
'मेरा भविष्य कहाँ है? '
एक किसान पूछेगा—
'मेरी मेहनत कहाँ है? '
एक माँ पूछेगी—
'मेरे बच्चे का मौका कहाँ है? '
और एक नागरिक पूछेगा—
'मेरा भरोसा कहाँ है? '
यही सवाल
लोकतंत्र की साँस हैं।
यही सवाल
उसकी पहचान हैं।
सवाल ये नहीं कि
कुर्सी पर कौन बैठा है,
सवाल ये है कि
जवाब कौन देता है।
सवाल ये नहीं कि
ताक़त किसके पास है,
सवाल ये है कि
ज़िम्मेदारी किसके पास है।
क्योंकि देश
किसी एक नाम से नहीं चलता,
देश करोड़ों लोगों की
उम्मीद से चलता है।
एक शिक्षक।
एक मज़दूर।
एक डॉक्टर।
एक किसान।
एक पत्रकार।
एक छात्र।
यही लोकतंत्र की असली आवाज़ हैं।
हम चमत्कार नहीं माँगते,
हम बस इतना चाहते हैं—
सच बोलना आसान हो,
ईमानदारी कमज़ोरी न हो,
और सवाल पूछना
गुनाह न हो।
क्योंकि जिस दिन
लोग डरकर चुप हो जाएँगे,
उस दिन लोकतंत्र मरेगा नहीं—
लेकिन उसकी रूह खो जाएगी।
इसलिए सवाल ज़िंदा रखो।
उम्मीद ज़िंदा रखो।
जवाब माँगते रहो।
क्योंकि लोकतंत्र की आख़िरी आवाज़
किसी संसद से नहीं आती,
किसी कुर्सी से नहीं आती,
किसी नेता से नहीं आती।
वो आती है
उस नागरिक से
जो अब भी पूछता है—
'क्या हम इससे बेहतर बन सकते हैं? '
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