डिग्री का बोझ Poem by AAHAN VARMA

डिग्री का बोझ

बचपन से बस एक ही बात सुनी थी,

'पढ़ लो बेटा,

ज़िंदगी बन जाएगी।'

माँ ने उम्मीद रखी,

बाप ने फीस भरी,

और बच्चे ने

जवानी किताबों में गुज़ारी।

स्कूल गया,

कॉलेज गया,

डिग्री पर डिग्री जोड़ता गया,

हर साल यही सोचकर—

'अबकी बार कुछ होगा।'

फिर एक दिन

डिग्री हाथ में आई,

और उसके साथ

एक लंबी कतार दिखाई।

हज़ारों चेहरे,

हज़ारों फ़ॉर्म,

एक नौकरी के पीछे

लाखों लोगों का शोर।

किसी ने गोल्ड मेडल लिया,

किसी ने टॉप किया,

पर इंटरव्यू के बाद

सबने एक ही सवाल किया—

'अब क्या किया जाए? '

सवाल ये नहीं कि

युवा पढ़ नहीं रहे,

सवाल ये है कि

पढ़कर भी बढ़ क्यों नहीं रहे?

सवाल ये नहीं कि

डिग्रियाँ कम हैं,

सवाल ये है कि

मौके कम क्यों हैं?

एक तरफ़ डिग्री बढ़ रही है,

दूसरी तरफ़ बेरोज़गारी,

और बीच में खड़ी है

पूरी एक पीढ़ी।

उन्होंने कहा था—

'पढ़ लो, ज़िंदगी बन जाएगी।'

हम आज पूछते हैं—

अगर पढ़ाई ही काफी थी,

तो मंज़िल इतनी दूर क्यों रह गई?

हम मेहनत से भाग नहीं रहे,

हम बस जवाब माँगते हैं—

अगर युवा देश की ताकत हैं,

तो उनकी बारी कब आएगी?

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