एक बच्चा बचपन से सुनता था,
'मेहनत करोगे तो आगे जाओगे, '
किताबों में भी यही लिखा था,
शिक्षकों ने भी यही बताया था।
उसने दिन-रात मेहनत की,
हर परीक्षा ईमानदारी से दी,
हर हार से कुछ सीखा,
हर जीत संभालकर जी।
फिर उसने देखा—
कुछ लोग दौड़ शुरू होने से पहले
मंज़िल के पास खड़े थे,
और कुछ अब भी
शुरुआत ढूँढ रहे थे।
किसी को नाम विरासत में मिला,
किसी को पहचान मिली,
किसी को रास्ते तैयार मिले,
किसी को बस कतार मिली।
सवाल ये नहीं कि
परिवार होना गलत है,
सवाल ये है कि
मेहनत पीछे क्यों है?
सवाल ये नहीं कि
विरासत क्यों चलती है,
सवाल ये है कि
प्रतिभा कब निकलती है?
एक तरफ़ लाखों युवा
मौके तलाशते हैं,
दूसरी तरफ़ कुछ दरवाज़े
जन्म से ही खुल जाते हैं।
हम ईर्ष्या नहीं करते,
हम बराबरी चाहते हैं,
क्योंकि सपनों की दुनिया में
शुरुआत सबकी एक जैसी होनी चाहिए।
अगर मंज़िल योग्यता से मिलती है,
तो फिर बताइए—
कुछ लोगों की दौड़
जन्म से आगे क्यों शुरू होती है?
क्योंकि किसी देश की सबसे बड़ी ताक़त
उसकी विरासत नहीं होती,
उसकी ताक़त वो प्रतिभा होती है
जो हर गली, हर घर में होती है।
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