बाप ने कहा था बेटा,
ईमानदारी से जीना,
मेहनत करना,
और सिर ऊँचा रखकर जीना।
बेटे ने वही किया,
दिन-रात मेहनत की,
हर नियम माना,
हर उम्मीद सही रखी।
फिर एक दिन समझ आया—
लाइन में सबसे आगे
मेहनत नहीं,
पहचान खड़ी थी।
कहीं नौकरी बिक रही थी,
कहीं ठेका बिक रहा था,
कहीं नियमों की किताबों से पहले
लिफ़ाफ़ा चल रहा था।
एक आदमी फाइल लेकर
दफ़्तर-दफ़्तर घूमता है,
काम छोटा होता है,
पर इंतज़ार बड़ा होता है।
फिर कोई धीरे से कहता है—
'थोड़ा खर्चा करना पड़ेगा...'
और अचानक
रुका हुआ काम चल पड़ता है।
सवाल ये नहीं कि
भ्रष्टाचार मौजूद है,
सवाल ये है कि
वो इतना मज़बूत क्यों है?
सवाल ये नहीं कि
कौन रिश्वत ले रहा है,
सवाल ये है कि
ईमानदार पीछे क्यों रह जा रहा है?
एक देश तब नहीं हारता
जब पैसा चोरी होता है,
देश तब हारता है
जब भरोसा चोरी होता है।
क्योंकि सड़कें फिर बन सकती हैं,
इमारतें फिर खड़ी हो सकती हैं,
लेकिन एक बार जनता का विश्वास टूट जाए—
तो पीढ़ियाँ लग सकती हैं।
हम चमत्कार नहीं माँगते,
हम बस इतना जानना चाहते हैं—
अगर नियम सबके लिए बराबर हैं,
तो कुछ लोग हमेशा आगे कैसे निकल जाते हैं?
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