एक छात्र सड़क पर निकला था,
हाथ में बस एक सवाल था,
दो साल की मेहनत के बाद—
उसका भविष्य बेहाल था।
माँ ने गहने गिरवी रखे,
बाप ने ओवरटाइम किया,
उसने बस इतना चाहा था—
ईमानदारी से जीना।
फिर खबर आई—
पेपर फिर लीक हुआ,
एक और परीक्षा रद्द हुई,
एक और सपना कमज़ोर हुआ।
कुछ ही घंटों में देखो,
बैरिकेड्स लग गए,
सड़कों पर पुलिस आ गई,
रास्ते बंद हो गए।
व्यवस्था इतनी तेज़ थी,
इतनी तैयार थी,
जैसे सवाल पूछना ही
सबसे बड़ी चुनौती थी।
सवाल ये नहीं कि
प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं,
सवाल ये है कि
घोटाले पहले क्यों नहीं रुक रहे हैं?
सवाल ये नहीं कि
सड़कें इतनी जल्दी बंद हो जाती हैं,
सवाल ये है कि
पेपर इतनी आसानी से खुल कैसे जाते हैं?
एक परीक्षा नहीं टूटी,
एक भरोसा टूटा है,
एक साल नहीं गया,
एक सपना छूटा है।
हम टकराव नहीं चाहते,
हम बस जवाब चाहते हैं—
अगर भविष्य बचाना ज़रूरी है,
तो ये फुर्ती पहले कहाँ थी?
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