हर महीने की पहली तारीख,
सैलरी खाते में आती है,
और उससे पहले ही
कटौतियों की सूची मुस्कुराती है।
पिता कहते—
'देश के लिए टैक्स देना पड़ता है, '
बेटा पूछता—
'तो बदले में क्या मिलता है? '
सड़क पर गड्ढे मिलते हैं,
अस्पतालों में लाइनें मिलती हैं,
बसों में भीड़ मिलती है,
दफ़्तरों में फ़ाइलें मिलती हैं।
हर साल टैक्स बढ़ता है,
हर साल वादे बढ़ते हैं,
पर टूटी हुई सड़कें पूछती हैं—
'हम कब सुधरते हैं? '
बारिश आती है,
शहर डूब जाता है,
एक छोटा सा सफ़र भी
इम्तिहान बन जाता है।
बीमार पड़ो तो
जेब पहले काँपती है,
इलाज से पहले
बिल की चिंता आती है।
सवाल ये नहीं कि
टैक्स क्यों लिया जाता है,
सवाल ये है कि
उसका हिसाब कहाँ दिखाया जाता है?
सवाल ये नहीं कि
नागरिक अपना फ़र्ज़ निभाते हैं,
सवाल ये है कि
वापस सुविधाएँ कब पाते हैं?
हम टैक्स देने से नहीं डरते,
हम विकास देखना चाहते हैं—
क्योंकि टैक्स तो हर बार समय पर आता है,
सेवाएँ समय पर क्यों नहीं आती हैं?
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