सवालों का देश? Poem by AAHAN VARMA

सवालों का देश?

कहते हो चुप रहो, सवाल मत पूछो,
वरना तुम गद्दार हो, ये हाल मत पूछो।

जो सच को लिखे, वो देशद्रोही कहलाए,
जो झूठ को बेचे, वो राष्ट्रभक्त बन जाए।

कलम उठी तो मुकदमे,
आवाज़ उठी तो जेल,
सच बोलने वालों के हिस्से
क्यों आते हैं सिर्फ़ खेल?

किसी को 'पाकिस्तानी',
किसी को 'एंटी-नेशनल' बताओ,
मगर पहले ये तो बताओ—
सवालों से इतना डर क्यों खाओ?

एक छात्र रातों को जागे,
माँ अपने सपने बेच दे,
बाप कर्ज़ में डूबकर फीस भरे,
फिर सिस्टम उसका भविष्य बेच दे।

'पेपर फिर लीक हो गया...'

एक पेपर नहीं लीक होता,
हर बार विश्वास लीक होता है,
मेहनत करने वाले बच्चे का
भविष्य नीलाम होता है।

कोटा रोता, छात्र रोते,
माँ की आँखें नम,
डिग्रियों के इस जंगल में
घुटता जाता दम।

स्कूलों में अब भी रटने का राज़ है,
सोचने की आज़ादी कम है,
इसीलिए बच्चा स्कूल से निकलकर
कोचिंग के जंगल में गुम है।

सरकारी स्कूल पूछ रहे हैं—

'क्या हम इतने कमज़ोर थे? '

कि देश का भविष्य
ट्यूशन और ऑनलाइन क्लासों को सौंप दिया गया।

रोज़ अख़बारों में बेटियों की चीखें आती हैं,
न्याय की राहें लंबी नज़र आती हैं,
कुछ ताकतवर चेहरे आरोपों के बाद भी दिख जाते हैं,
और आम लोग बस सवाल उठाते रह जाते हैं।

टैक्स तो बढ़ते जाते हैं,
हर साल के साथ,
पर टूटी सड़कें पूछती हैं—

'कहाँ गया विकास? '

प्रदर्शन हो तो
बैरिकेड्स की दीवारें खड़ी,
हज़ारों पुलिसकर्मी तैनात खड़े,

पर पेपर लीक कराने वाले गिरोहों पर
व्यवस्था क्यों पड़ी पड़ी?

हर चुनाव में नया मेला है,
धर्म इधर, सेक्युलरिज़्म उधर ठेला है,
जनता फिर कतारों में खड़ी रहती है,
कुर्सी का खेल अकेला है।

हिंदू-मुस्लिम, जाति-वर्ग,
हर बार नए नाम मिल जाते हैं,
ताकि शिक्षा, बेरोज़गारी और स्वास्थ्य के सवाल
फिर पीछे छूट जाते हैं।

मीडिया की रोशनी बहुत है,
पर अँधेरा कम नहीं होता,
हर रात बहसें जलती हैं,
पर सच कहीं दिखता नहीं होता।

शोर जीत जाता है,
सवाल हार जाते हैं,
और लोग सोचने से पहले
मानना सीख जाते हैं।

हम चाँद तक पहुँच गए,
अंतरिक्ष में झंडा गाड़ दिया,
पर आज भी लाखों बच्चों को
अच्छी शिक्षा से दूर रखा।

जापान की मिसाल देते हो,
कोरिया का सपना दिखाते हो,
पर अपने ही बच्चों को
कोचिंग की कतारों में छोड़ आते हो।

हम न सत्ता के हैं,
न विपक्ष के यार,
हम तो बस पूछ रहे हैं—

कहाँ है वो सुधार?

देश से मोहब्बत है,
इसीलिए सवाल हैं,
खामोशी नहीं,
बदलाव के ख्याल हैं।

क्योंकि वतन वो नहीं
जहाँ डर में जिया जाए,

वतन वो है
जहाँ सच बिना डर के कहा जाए।

और जिस दिन सवाल मर जाएँगे,
उस दिन संविधान रोएगा,

चुनाव तो होते रहेंगे...

पर लोकतंत्र खो जाएगा।

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