पेपर लीक का देश Poem by AAHAN VARMA

पेपर लीक का देश

सुबह के चार बजे उठकर,
सपनों को किताबों में बोया था,
माँ ने अपनी ज़रूरत छोड़ी,
बाप ने कर्ज़ का बोझ ढोया था।

दो साल तक बस एक ही मिशन,
'इस बार ज़िंदगी बदलनी है, '
फिर मोबाइल पर एक लाइन आई—

'पेपर लीक, परीक्षा रद्द करनी है।'

ना नंबर हारे,
ना मेहनत हारी,
सिस्टम ने फिर
ईमानदारी मारी।

कहते हैं—
'पढ़ो बेटा, मेहनत रंग लाएगी, '
पर हर साल कोई माफिया
पूरी परीक्षा खा जाएगी।

कोटा रोया,
होस्टल रोए,
कितने सपने बीच रास्ते खोए।

किसी ने नींद गंवाई,
किसी ने बचपन,
किसी ने तो ज़िंदगी ही हार दी
इस अंधी दौड़ के कारण।

सवाल ये नहीं कि
पेपर कैसे लीक हुआ,

सवाल ये है कि
हर बार कौन बच गया?

प्रोटेस्ट हो तो
हज़ार बैरिकेड खड़े हो जाते हैं,
लेकिन पेपर बेचने वाले
इतने आसानी से छूट जाते हैं?

एक पेपर नहीं लीक होता,
हर बार भरोसा लीक होता है,

और जब भरोसा मर जाए—
तो भविष्य नीलाम होता है।

हम सत्ता से नफ़रत नहीं करते,
हम बस जवाब माँगते हैं—

अगर प्रश्नपत्र सुरक्षित नहीं,
तो हमारा भविष्य सुरक्षित कैसे है?

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