Gulab Khandelwal

(21 February 1924 - / Navalgarh / India)

अब तुम नौका लेकर आये - Poem by Gulab Khandelwal

अब तुम नौका लेकर आये
जब लहरों में बहते-बहते हम तट से टकराये!

जब सब ओर अतल सागर था
सतत डूब जाने का डर था
तब जाने यह प्रेम किधर था
ये निःश्वास छिपाये!

अब जब सम्मुख ठोस धरा है
छूट चुका सागर गहरा है
मिला निमंत्रण स्नेहभरा है-
'लो, हम नौका लाये'

क्या यह नाव लिए निज सिर पर
नाचें हम अब थिरक-थिरककर!
धन्यवाद दें तुम्हें, बंधुवर!
दोनों हाथ उठाये!

अब तुम नौका लेकर आये
जब लहरों में बहते-बहते हम तट से टकराये!


Comments about अब तुम नौका लेकर आये by Gulab Khandelwal

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Friday, April 6, 2012

Poem Edited: Friday, April 6, 2012


[Report Error]