Sachchidananda Vatsyayan

(7 March 1911 – 4 April 1987 / Kushinagar, Uttar Pradesh / British India)

अनुभव-परिपक्व - Poem by Sachchidananda Vatsyayan

माँ हम नहीं मानते-
अगली दीवाली पर मेले से
हम वह गाने वाला टीन का लट्टू
लेंगे हॊ लेंगे-
नहीं, हम नहीं जानते-
हम कुछ नहीं सुनेंगे।

-कल गुड़ियों का मेला है, माँ।
मुझे एक दो पैसे वाली
काग़ज़ की फिरकी तो ले देना।
अच्छा मैं लट्टू नहीं मांगता-
तुम बस दो पैसे दे देना।

-अच्छा, माँ मुझे खाली मिट्टी दे दो-
मैं कुछ नहीं मांगूंगा :
मेले जाने का हठ नहीं ठानूंगा।
जो कहोगी मानूंगा।


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Poem Submitted: Sunday, April 1, 2012

Poem Edited: Monday, April 2, 2012


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