उस दहलीज की बेटी Poem by ARYAN KUMAR

उस दहलीज की बेटी

वह जो खिड़की पर टंगी एक पुरानी ज़ंजीर है,
शायद मेरे मुक़द्दर की वही तस्वीर है।
माँ के होठों की लाली, जब ज़ख़्मों को छुपाती है,
तवायफ़ की वह बेटी, हर रात मर जाती है।
मैं खिलौनों से नहीं, घुँघरुओं की खनक से जागी हूँ,
मैं अपनी ही परछाईं के साये से भागी हूँ।
लोरी की जगह मैंने सुना है सौदों का शोर,
मेरे आँगन की धूप पर भी, हक़ जताता है कोई और।
जब गली के बच्चे स्कूल का बस्ता उठाते हैं,
वे मुझे देख कर नफ़रत से सर झुकाते हैं।
मेरा क़सूर क्या है? बस यही कि मैं वहाँ जन्मी हूँ?
जहाँ इज़्ज़त की बोली लगती है, और रूह की कमी है?
माँ की आँखों में जब थकावट का समंदर देखती हूँ,
मैं खुद को बिकते हुए उस बिस्तर के अंदर देखती हूँ।
वह मुझे चूमती है तो उसके हाथों से इत्र की महक आती है,
पर उस इत्र के पीछे छुपी लाश, मुझे डरा जाती है।
सब कहते हैं— 'यह भी कल इसी बाज़ार की रौनक बनेगी, '
क्या मेरे सपनों की कभी कोई बस्ती नहीं सजेगी?
मेरे माथे की बिंदी भी, मंदिर की देहरी चूमना चाहती है,
पर मेरे पाँवों की नियति में, बस घुँघरुओं का शोर लिखा है।
ख़ुदा! क्या तूने मेरा हिस्सा बस दर्द से लिखा है?
क्या मेरी माँ का आँचल, सरेआम बिका है?
मैं बेटी हूँ उसकी, जिसे दुनिया ने सिर्फ़ शरीर माना,
मगर मैंने उसी तपती देह को अपना शीतल आसमान माना।
वह छत से गिरती सीलन नहीं, मेरी माँ का बहता काजल है,
जहाँ रूह बेची जाती है, वह सड़ा हुआ एक दलदल है।
मैंने बचपन में ही सीख लिया, कि मर्द की नज़र क्या होती है,
जब माँ के कमरे की चटकनी, आधी रात को सोती है।
बाहर महफ़िल जमती है, अंदर साँसें घुटती हैं,
तवायफ़ की वह आबरू, किस्तों में रोज़ लुटती है।
मैं कोने में सिमट कर, कानों पर हाथ धर लेती हूँ,
जब माँ की सिसकी के ऊपर, किसी ग़ैर की हँसी सुनती हूँ।
वह मुझे 'शहज़ादी' कहती है, पर महल मेरा श्मशान है,
यहाँ बिकता हुआ गोश्त ही, हमारे पेट का सामान है।
मेरी किताबों पर अक्सर, शराब के छींटे पड़ते हैं,
यहाँ मर्यादा के नहीं, बस जिस्मों के सौदे होते हैं।
सब पूछते हैं— 'तेरा बाप कौन है? कहाँ से आई है? '
मैं क्या कहूँ कि मेरी पैदाइश, एक गुमनाम रुसवाई है?
हज़ारों चेहरे गुज़रे हैं, माँ के उस गंदे बिस्तर से,
मैं किसका अक्स ढूँढूँ, इस कीचड़ भरे समंदर में?
पायल की वह छम-छम, मेरी रूह में कील चुभाती है,
जब वह सजे-धजे ग्राहक की, जूठी प्लेट उठाती है।
माँ मुझे डॉक्टर बनाना चाहती है, इस गलीज अंधेरे से दूर,
पर समाज के तंज़ मार देंगे, हमें 'तवायफ़' कह के मजबूर।
थक गई हूँ मैं, इस इत्र और पसीने की गंध सहते-सहते,
पत्थर हो गई हूँ, चुपचाप इन ज़ख़्मों को बहते-बहते।
ऐ ख़ुदा! या तो हमें इंसान मान, या यह खेल बंद कर दे,
या इस कोठे की आग में, मुझे भी जला कर भस्म कर दे।

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