मलाल-ए-ज़ब्त Poem by ARYAN KUMAR

मलाल-ए-ज़ब्त

ग़म-ए-हयात का मंज़र कमाल रखा है,
मलाल कुछ भी नहीं, बस मलाल रखा है।

वो आएँगे कभी फुरसत में पूछने हमसे,
इसी उम्मीद ने हमको बहाल रखा है।

जवाब दे न सके जिसका अक़्ल वाले भी,
हमारे इश्क़ ने ऐसा सवाल रखा है।

दिए जलाए हैं तूफ़ाँ की ज़द में रहकर भी,
हवा के हाथ में हमने रुमाल रखा है।

अज़ल' की धूप से बच पाना अब मुहाल कहाँ,
कि सर पे साया-ए-माज़ी ने जाल रखा है।

वजूद अपना ही बोझ अब उठा नहीं पाता,
ग़ुरूर-ए-ज़ब्त ने सब संभाल रखा है।

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
यह ग़ज़ल महज़ शब्दों का मेल नहीं, बल्कि उन खामोश चीखों का मंज़र है जिन्हें हम अक्सर 'मलाल' के पीछे छुपा लेते हैं। यह उन लोगों के नाम है जो अंदर से टूटने के बावजूद दुनिया के सामने ढाल बनकर खड़े हैं।
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