व्यायाम कर Poem by Chhaviraj Chauhan

व्यायाम कर

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दिल से दिल लगा के दुलार कर
धड़कता है दिन रात इसका आभार कर
तला भुना खाने को तु इनकार कर
व्यस्त जीवन से थोड़ा समय निकाल कर
व्यायाम कर थोड़ा तु व्यायाम कर

ये दिल ही है जो जीवन का आधार है
बिना इसके हम सभी एक मृत लाश है
अहमियत को इसकी तु पहचान कर
व्यायाम कर थोड़ा तु व्यायाम कर।

किसी का भ्रात तु, किसी का भरतार हैं
जनक किसी का तु, किसी माँ का तु लाल हैं
रिश्तो का मोल है अनमोल ये तु जानकर
व्यायाम कर थोड़ा तु व्यायाम कर।


जिया है जिंदगी अब तक वो बेमिसाल हैं
दोलत भी अगर तेरे पास बेसुमार हैं
चिकित्सक का आना जाना भी तेरे द्वार हैं।
निकलते ही प्राण न आयेंगे काम ये विचार कर
व्यायाम कर थोड़ा तु व्यायाम कर।

जीने का अंदाज तेरा अगर बिंदास हैं।
दीर्घ आयु की मन मै तेरे एक आस है।
सगे संबंधी तेरे लिये अगर खास है।
मित्रो के लिये भी तेरी हर एक साँस हैं
बिछड़ने की पीड़ा को अहसास कर।
व्यायाम कर तु थोड़ा व्यायाम कर।


भागदोड से जिंदगी की तु परेशान हैं
जीवन मे न ही अगर आराम है
करता तु दिन रात सिर्फ काम हैं
पाना चाहता तु हर एक मुकाम है।
व्यस्तता को दिन भर की दरकिनार कर
व्यायाम कर तु थोड़ा व्यायाम कर।

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