हृदय Poem by Harshit kaira

हृदय

अंकगणित के प्रश्नों से निकल के
दर्शन से मनोविज्ञान में पिघल के

कला, साहित्य, विज्ञान के हाशिए से
मैने तुम्हे पढ़ा है मिट्टी के दिए से

ऊपर इन पुरानी आदतों के
ऊपर इन कपासी बादलों के

रचा बसा है मेरा रचना संसार
जहां आती जाती हो तुम बार बार

मेरा स्मरण, लेख, छंद में
बस तुम्हारी ही गंध है

तुमसे टीका तुकबंदी का जतन है
तुमसे महकता मेरा हृदय सदन है

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