एक आखर Poem by Harshit kaira

एक आखर

क्यों स्वपन सुनहरे बिसा जाती हो
क्यों चलते चलते रिसा जाती हो
अभी तुम मां की गोद में सिरान बनी थी
अभी तुम भाबर गए बखई सी वीरान बनी हो
अभी उकाव सी कठिन थी
अभी हुलार सी आसान बनी हो
अभी तुम थी उपराव यार
अभी तुम सीमार बनी हो
एक आँखर अंततः झांक ही दिया ना
तुमने मुझे
अभी झरोखों से, अभी उखोव से

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success