Sunday, May 10, 2015

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सोच रही हूँ ऑंखें मूंदें, क्या बचपन फिर लौट सकेगा..
इस जीवन की पटरी पर, कब तक मस्तिष्क यूँ ही ईंधन जैसा फुकेगा|

बचपन से हैं सुनते आये, जो बीत गया सो बीत गया..
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Nisha Bala
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