Poem Poem by Vinod Pandey

Poem

मेरी उन शोहरतों का क्या, मेरे मौला पता दे दे,
वजह उन शोहरतों की जो, जरा उनको जता दे दे
संशय की घडी में आज, क्या करना बड़ी दुविधा,
हुई दुस्वार हम सबसे, ज़माने की बची सुविधा
नहीं होते हमारे फैसले माफिक हवाओं के,
तकाजे दे दिए जाते उन्हें बीते गुनाहों के
हुए आजाद पंक्षी वो, पड़ा विखरा हुआ पिंजरा,
नहीं झुक पाउँगा अब मै, दबाने उन गुनाहों को
समेटा जा नहीं सकता गुनाहों के विवेचन को,
करे दुनिया जो परिभाषित, बढे जड़ से वो चेतन को
व्यथित हूँ आज अन्दर से, मै उस इकरार के आगे,
जिसे मै कर नहीं सकता, जमाना ना कहे भागे
था अहसास हमको भी ज़माने की बगावत से,
हमेशा फेरता मुह मै, ऐसी उन अदावत से
न थी उम्मीद उनको ही, न थी उम्मीद मुझको ही,
चुनेगे पथ सरीके इस, ज़माना पार जाने की
मेरा मंगलकलश शुभकामना देते दिखे उनको,
कवायद की शुरू जिसने ज़माना पार जाने की...

Tuesday, March 15, 2016
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success