सफर Poem by Sachin Tiwari

सफर

क्यों हुआ निराश तू, सफर से ओ मुसाफिर l
ये तो वो लम्हा है, जो यूं ही गुजर जायगा ll

मंज़िल जब होगी हांसिल, यकीनन l
तुझे बस ये तेरा सफर ही याद आएगा ll

कितनी कर ले कोशिश, ये वक़्त कभी ठहरा नहीं l
तू खुद गुलाम है इसका, इस पर तेरा पहरा नहीं ll

लाख रोकना चाहेगा तू, पर वक़्त गुज़रता जायगा l
दुनिया की इस चकाचौंध में, उलझा ही रह जायगा ll

अंत समय में तुझको, ये तेरा सफर ही याद आएगा ll

पैर तेरे जब डगमग होंगे, आँखों से देख न पाएगा l
चाह के भी उठ न सकेगा, एसा वक़्त भी आएगा ll

जीवन का ये फलसफा, जब सिमटता ही जायगा l
अंत समय में तुझको, ये तेरा सफर ही याद आएगा ll

दूर झमेलों से निकल, दुनिया अपनी आबाद कर l
आँखे अपनी बंद कर, फिर गहरी सी एक साँस भर ll

दुख दर्द को अपने भूलकर, तू हल्का आत्मसात कर l
एक सुकूं मिलेगा दिल को, दिल हल्का हो जायगा ll

भाग दौड़ तू कर ले कितनी, कुछ भी हाथ न आएगा l
अंत समय में तुझको, ये तेरा सफर ही याद आएगा ll

सफर
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