मसला तो बस रोटी का है, साहेब
वरना वो कहां इतना मजबूर होता
उसके भी दिल में कुछ सपने पलते
आँखों में जिन्हें पाने का नूर होता
पर क्या करें, जब भूख दस्तक देती है
तो सपनें महज लकीरों पर नाचते है
जिन हाथों में किताबें होना लाजमी थी
वो आज पत्थरों से किस्मत तराशते हैं।
कुछ सोचने की, फुर्सत ही कहां है उन्हें
कल की फिक्र में, आज गुजर जाता है
ये आज भी बंधे है, औऱ कल भी है गिरवी
देख दीन दशा एसी, विश्वास मुकर जाता है
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