काठ आरु पथर
गजानन मिश्र
इ काठ आरु पथर भितरे
एतकि थिसि जुए!
इ सुरज भि पुडिकरि
कला पडिजाएसि ।
पाएन आरु पबनर
इ खेल चालुथिसि एन्ता,
केन जउछे केन अउछे
भाबबार नेइ मिलु कि
नेइ मिलु माएनता ।
फुल फुटु कि नेइ फुटु
खरा हउ कि हउ शित
हजिगले समिआ भितरे
गुपत गँएठ फिटला हेटा
सरे नेइ किछु पक्का कथा।
तपोवन, टिटिलागड, बलाङ्गिर
19/8/2019
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem