Shiv Kumar Batalvi

(23 July 1936 - 7 May 1973 / Punjab / British India)

सूरज दा मर्सिया - Poem by Shiv Kumar Batalvi

अज अमनां दा बाबल मरया
सारी धरत नड़ोये आयी
ते अम्बर ने हौका भरया
इंज फ़ैली दिल दी खुश्बोई
ईकन रंग सोग दा चड़या
जीकन संघने वन विच किदरे
चन्दन दा इक बूटा सड़या
तहज़ीबां ने फूहड़ी पाई
त्वारीख़ दा मथा ठर्या
महज़बां नूं अज आई तरेली
कौमां घुट कलेजा फड़या
राम रहीम गए पथराये
हरमंदिर दा पानी डरया
फेर किसे मरियम दा जाया
अज फरज़ान दी सूली चड़या
अज सूरज दी अर्थी निकली
अज धरतीदा सूरज मरया
कुल लोकी मोढा दित्ता
ते नैनां विच हंजू भरया
पई मनुखता ताईं दंद्लन
काला दुःख ना जावे जरया
रो रो मारे ढिढी मुक्कियां
दस्से दिशावां सोगी होइयां
ईकन चुप दा नाग है लड़या
जियों धरती ने अज सूरज दा
रो रो के मर्सिया पढ़या
अज अमनां दा बाबल मरया


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Poem Submitted: Monday, March 26, 2012

Poem Edited: Monday, March 26, 2012


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