न जाने हम किस ओर चल दिए हैं?
ज़िंदगी ने ऐसे भरपूर पल दिए हैं,
सबके लिए हम भले ही खरे हो गए,
स्व में झाँका तो, ज़ख़्म हरे हो गए।
अब तो दर्द भी आहट नहीं करता है,
चुपके से दस्तक दे कर आहें भरता है,
दर्द के लिए भी अब हम पराये हो गए,
मरहम ने ही कुरेदा और ज़ख़्म हरे हो गए।
बाँहें फैलाये ज़माने का ये दस्तूर है मित्रों,
किसी के करीबी हो कर, करीबी नहीं मित्रों,
नज़दीकियों से हम अब मन भरे हो गए,
दूरियाँ ही सही अब क्योंकि ज़ख़्म हरे हो गए।।
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