मेरी व्यथा: ज़ख़्म हरे हो गए Poem by Veer Dhiman

मेरी व्यथा: ज़ख़्म हरे हो गए

न जाने हम किस ओर चल दिए हैं?
ज़िंदगी ने ऐसे भरपूर पल दिए हैं,
सबके लिए हम भले ही खरे हो गए,
स्व में झाँका तो, ज़ख़्म हरे हो गए।

अब तो दर्द भी आहट नहीं करता है,
चुपके से दस्तक दे कर आहें भरता है,
दर्द के लिए भी अब हम पराये हो गए,
मरहम ने ही कुरेदा और ज़ख़्म हरे हो गए।

बाँहें फैलाये ज़माने का ये दस्तूर है मित्रों,
किसी के करीबी हो कर, करीबी नहीं मित्रों,
नज़दीकियों से हम अब मन भरे हो गए,
दूरियाँ ही सही अब क्योंकि ज़ख़्म हरे हो गए।।

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
ज़ख़्म हरे हो गए, एक गहन व्यथा है जिसमें उन पुराने बीते पलों ने किस प्रकार जीवन को प्रभावित किया है ये बताया गया है।
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Veer Dhiman

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