दिल में है जिंदा, उम्मीद की कहानी अभी।
थक गया हूं बेशक, पर हार न मानी अभी।।
काटों भरी राह में, ज़ख्म मिल चुके हैं कई।
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मसला तो बस रोटी का है, साहेब
वरना वो कहां इतना मजबूर होता
उसके भी दिल में कुछ सपने पलते
आँखों में जिन्हें पाने का नूर होता
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एक घने कोहरे से, गुजर रहे है हम इन दिनों l
नजरों के सामने होकर भी, नजर वो आते नहीं ll
दो कदम बढ़ाकर रुक गए वो, और हम चलते रहे l
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क्यों हुआ निराश तू, सफर से ओ मुसाफिर l
ये तो वो लम्हा है, जो यूं ही गुजर जायगा ll
मंज़िल जब होगी हांसिल, यकीनन l
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उसकी ही छांव तले आराम करने लगे
जिसे काटते- काटते थक गए थे, बेपीर
बेशर्मी की इन्तेहाँ से, वाकिफ जो न थे
न कुल्हाड़ी रूकी, न ही फलों का गिरना
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