AKHIL GUPTA


AKHIL GUPTA Poems

1. Kaisi Ye Azadi 8/15/2012

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Kaisi Ye Azadi

हमने देखा था एक सपना,
देखा था एक सपना स्वतंत्र मज़बूत भारत का,
हमने सोचा था कभी,
सोचा था कभी हम फिर सोने की चिड़िया कहलायेगे,
हमने चाहा था कभी,
चाहा था कभी हम भी जाति धर्म से उठकर एक जुट हो जायेगे,

मगर ये हो न सका,
हो न सका क्यूकि:

देखा हुआ सपना हो न सका साकार,
टूट गया वो हो गया चकनाचूर, हम हो गए फिर गुलाम
हो गए गुलाम कुछ चंद चुने हुए सफेदपोशो के,

जो सोचा था हमने वो हम कर न सके,
कर न सके क्यूकि हम थे मजबूर,
थे मजबूर क्यूकि निगल गए कुछ लोग हमारी अपार संपदा को ,

जो चाहा था हमने, वो हम चाहते हुए भी कर न सके,
कर न सके ...

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