rishabh sethia

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कल कल कल कब आएगा ये कल - Poem by rishabh sethia

कल कल कल कब आएगा ये कल,
जिंदगी बीत जाती है। नही आता तो बस ये कल! !
अंधेरी रात के बाद आता है नया सवेरा,
बीत जाते हैं पुराने सारे पल,
नही आता तो बस ये कल! !

धूप और छांव जिंदगी यही खेल है,
और यह समय कभी न रुकने वाली रेल है।
जो दुखों के इन तूफानों को झेल न पाया,
वो यहां फेल है।।

हर दिन सोचता हूं कब मिलेगा मुझे मेरी
महनत का फल,
नहीं आता तो बस ये कल कल कल ! !

Topic(s) of this poem: amazing, beautiful, day, families, hindi, indian, poem, poet, poetry, poets


Comments about कल कल कल कब आएगा ये कल by rishabh sethia

  • Rajnish Manga (9/15/2015 8:49:00 PM)


    यह एक प्यारी कविता है जिसमें जीवन की अनिश्चतता, सुख-दुःख व अनागत का इंतज़ार दिखाया गया है. बहुत सुंदर:
    धूप और छांव जिंदगी यही खेल है,
    और यह समय कभी न रुकने वाली रेल है।
    (Report) Reply

    Rishabh Sethia (9/16/2015 1:29:00 AM)

    Rajnish sir, Thanks a lot for this comment it actually means a lot and it inspired me.. I am glad that you read my poems.. Tahe dil se dhanyavad :)

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Poem Submitted: Wednesday, September 9, 2015



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