Upendra Singh 'suman'

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फिर दो गीता का कर्म ज्ञान - Poem by Upendra Singh 'suman'

फिर दो गीता का कर्म ज्ञान
हे योगिराज तुमको प्रणाम, फिर दो गीता का कर्म ज्ञान.

असमंजस में बैठा अर्जुन, घुट रहा सत्य का स्वाभिमान.
दुर्योधन की मनमानी से, आहत है जन का आन-मान.
हे योगिराज तुमको प्रणाम...................................

जन-मन का स्वप्न प्रवंचित है, अपराधी हैं रचते विधान.
जिसकी लाठी भैंस उसी की, आहें भरता है संविधान.
हे योगिराज तुमको प्रणाम..................................
है कंस अभी तक मरा नहीं, जीवित हैं जग में हैवान.
कालिया दुष्ट यमुना जल को, कर रहा प्रदूषित गरलवान
हे योगिराज तुमको प्रणाम..................................

है काला बन गई बला विकट, अब भस्मासुर सदृश्य विज्ञान.
है ध्वस्त मनुजता का गौरव, संसद में है नित घमासान.
हे योगिराज तुमको प्रणाम..................................

स द्वृतियां हैं अब तार-तार, यह कलियुग का कैसा विधान.
ये छल-प्रपंच का दौर विषम, अब कृपा करो करूणा निधान,

उपेन्द्र सिंह ‘सुमन.


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Poem Submitted: Sunday, December 6, 2015



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