हमने मजाक-मजाक में
उनसे कहा-
साली तो आधी घरवाली होती है
इतना सुनना था कि
स्वभाव से सीधे-साधे
मगर टेढ़ी कमरवाले
मुसद्दीलाल जी गुस्से में
सांप की मानिंद तन गये,
मैनें क्षमा भाव से कहा -
अरे, आप तो नाराज हो गये.
गुस्से में साक्षात् गजराज हो गये.
मेरे इस कथन का और भी असर उल्टा हुआ
क्रोध के मारे उनके नथुने फड़क गये
वे मेरे उपर बुरी तरह भड़क गये.
बोले -
आप की नीयत क्या है
हम अच्छी तरह जान गए,
इतना ही नहीं,
हम आपको बखूबी पहचान गये.
अरे, साली हमारी है,
शोख है, हसीन है, अभी कुंवारी है,
आप उसे बाँटनेवाले कौन होते हैं?
अच्छी-भली चीज को काटनेवाले कौन होतें हैं?
जो पूरी की पूरी हमारी है
उसे आप आधा बता रहे हैं,
हमारी खुशियों की होली जला रहें हैं,
हमारे हक़ पे छूरी चला रहे है.
अरे, जाइये
दफा हो जाइये यहाँ से
प्यारी सी सच्चाई को धता बता रहे हैं,
एक अच्छे-भले इंसान को क्यों सता रहें हैं.
उपेन्द्र सिंह ‘सुमन'
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem
हास्य-व्यंग्य की बहुत रोचक कविता. धन्यवाद, उपेन्द्र जी.