नहीं मोक्ष की मुझे कामना, नहीं स्वर्ग का द्वार चाहिये.
वरदानों की चाह नहीं कुछ, मुझे तुम्हारा प्यार चाहिये.
जन्मों-जन्मों का साथ न था, सौभाग्य मेरा जो इठलाया.
कैसे उसको मैं व्यक्त करूं, शब्दों में जो न समा पाया.
जग जीतूँ मैं तुमसे हारूं मुझको मन का हार चाहिए.
नहीं मोक्ष की मुझे कामना, नहीं स्वर्ग का द्वार चाहिये.
तेरे मादक मृदु अधरों पर, अगणित अमृत घट न्यौछावर.
तुम अप्रतिम अद्भुत अनुपम, मैं भ्रमर नित्य भरता भांवर.
नहीं-नहीं कुछ और नहीं बस तेरा ही आधार चाहिये.
नहीं मोक्ष की मुझे कामना, नहीं स्वर्ग का द्वार चाहिये.
तेरे मदिर रूप यौवन को, उपमायें बतलाओ क्या दूँ.
घन-घमंड काली अलकों को, तुम्हीं बताओ क्या कह दूँ.
मूक हो रही वाणी को अब देवों का उद्गार चाहिये.
नहीं मोक्ष की मुझे कामना, नहीं स्वर्ग का द्वार चाहिये.
तुम वेद मन्त्र की महा ऋचा, तुम गीता हो तुम रामायण.
तुमने ब्रह्मा की सृष्टि रची, तुम नारी नर की नारायण.
भव सिन्धु किनारा पाने को बस तेरा ही मझधार चाहिये.
नहीं मोक्ष की मुझे कामना, नहीं स्वर्ग का द्वार चाहिये.
उपेन्द्र सिंह ‘सुमन’
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