Shashikant Nishant Sharma

Rookie - 133 Points (03 September,1988 / Sonepur, Saran, Bihar, India)

मंजिल तक - Poem by Shashikant Nishant Sharma

यह वर्तमान युग है
कलियुग नहीं कलयुग है
'साहिल' बात कहे बात सही
यहाँ टिक सकता वही
जिसके पास है बल
चालाकी, बुद्धि और छल
और जनता हो आधुनिक कल
जिए तो सिर्फ आज
न करे चिंता कल की
हो जिसका मस्तमौला अंदाज
यह युग उस आदमी के लिए नहीं
जो सोचता है क्या गलत और सही
यहाँ वही टिक सकता
जो दूसरों को धकेल सकता
और बिना सोचे आगे बाद सके
छोड़ जग को पीछे
यदि तू नहीं धकेलेगा
तो कोई और धकेलगा
और बढेगा तुझसे आगे
बैठ कर न सोच मेरे भाई
देख सामने मंजिल आई
यदि कुछ करना चाहते हो
सफल होना चाहते हो
तो बैठों नहीं हाथ मलते
उठो और दौड़ों, रहो चलते
रहो अपने लक्ष्य पे अटल
बस मंजिल ही रहे नजर में हरपल
हर मुश्किल का पत्थर
जो आ जाये पथ पर
उसे तुम दो धकेल
खेल नया ये खेल
और बढ़ते रहो
जब तक कि
मिले न मंजिल
जिसे चाहता है दिल
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'


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Poem Submitted: Tuesday, January 29, 2013



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