जख्मी दिल की आवाज
खामोश सुनी रातों में
सिसकते बेबस दिल की
आवाज कभी सुना तुमने ।
रिसता हुंआ पाषाण
और पिघलता सूरज का
दर्द कभी सुनी तुमने ।
क्या चीज का बना
ये तेरी बेरहम दिल
अपने हीं थडकन, सुनाही ना दे ।
मेरा प्यार दौलत के ढेर में
कब का खो गया
हक़िक़त यही हैं, भला तुझे कड़वा लगे ।
तू तो मेरे सांसो मे बसी खुशबू थी
मौसम की तरह तू कब बदली
मजबूरी तो बस तेरी बहाना था ।
वादा जो कि सब तोड़ के तू
पलभर में कैसी परायी बनी तू
मासूमियत के पिछे छुपा, एक बेबफा तू ।
काश! मेरी सांस रुक जाए
और रुह तेरी पास हीं रहे
मौत के वाद मुझे सकून मिले ।
तकलिफ अब अल्फाजों में
लिखा नहीं जाता मुझसे
मेरे जख्मों का बजह सिर्फ तू हैं ।
और हा! कम्बख़्ख़्त ए- दिल
मरकर भी भूला न पावगे
बेपनाह इश्क जो कि तुमसे ।
रचनाकार: - -तुल्सी श्रेष्ठ
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बेहतरीन कविता एक बहुत बेहतरीन कवि जी के द्वारा आपका बहुत - बहुत आभार