Dr. Navin Kumar Upadhyay


जब हम छोटे बच्चे थे - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

तब हम कितने अच्छे थे! ,
जब हम छोटे बच्चे थे।।
जाति-वण^-धर्म-लिंग -बोली,
न था कभी मन मेंंभेदभाव ।
कौन है अपना, कौन है पराया,
विषम बीज, विफल हो गए दाँव।।
एक दूजे का हाथ हम पकड़े,
एक बाँह सदा जुड़े रहते हम।
साथ खाना, साथ पीना-सोना,
दिन-रात एक साथ रहते हम।।
सभी सभी के साथ सदा रहते,
सभी थे, एक दूजे पर मरते ।
सभी हँसते, एक दूजे पर लोटते,
नाचते-गाते-नयन देख थिरकते।।
कभी पेड़ पर जाते थे हमसब मिल,
टहनियों को थे झकझोर हिलाते ।
गिर जाती जब इमली तरुवर से,
हम आपस में, एक दूजे से छुड़ाते।।
यदि किसी ने छीनाऔर मुँह रख लिया,
हम तनिक भी हार, स्वीकार न करते।
उसको पटक, उसका मुँह कौर निकाल,
अपने मुख डाल, अपने को विजयी बनाते।।
कभी पेड़ पर उचक चढ़ जाते थे हम,
बातों-बातों में करते, आसमाँ की सैर।
बफों पर खेलना, सरकना-लुढकना,
प्रियतम था आँख मिचौनी का खेल।।
न ही थी हम पर को अपनी जिम्मेवारी,
दुनिया के गम-दुख से े न रिश्ता-नाता।
वही करते हम सब बच्चे मिलकर एकसँग,
जो सबको हँसाता, न किसी को रुलाता।।
पड़ोस के अँकल का घर मेरा था अपना,
खेलने का उनके बच्ची के साथ, रहता सपना।
आँटी नहलाती, कपड़े पहनाती, पाउडर लगाती,
खाना खिलातीं, अपने करतल थपकियो दे सुलाती।।ं
आज वे दुनियाँ में नहीं, उनकी हर बोलियाँ मुझे याद,
उनकी हर कहानियों का रहता था, कैसा जु़दा स्वाद।
आज यदि दुनिया में वो रहती, हम सयाने न कहा सकते,
मेरी महामहिमा मँडित माँ, तब हम बच्चे कितने अच्छे थे।।

Topic(s) of this poem: childishness


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Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



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