Dr. Navin Kumar Upadhyay


पी गया मेरा अधर रस कौन - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

पी गया मेरा अधर रस कौन?
मुझे प्यासा बना गया कौन?
मेरा दिल सुनसान वीरान,
सूनी मिट्टी, सूना आसमान,
नभ जगमगाते अनेकों तारे,
उनमें एक न हो सके हमारे,
जीवन के अनजान क्षितिज में
आखिर वह बस गया कौन?
सूना घर, सुनसान उपवन,
तनहाई में बोझिल होता मन,
कोरा कागज के इस जीवन में,
आखिर दाग बना गया कौन?
क्यों है छिपता मेरी नजरों से,
क्या मतलब बस मेरी अधरों से,
आखिर तू तो खोल अपने अधर,
और तोड़ दे, तू अपना मौन ।
आ जा यार! गले तू लग जा,
और सीने से मेरे मिल जा,
अपने ही आगोश में भर कर,
'नवीन' बोल दो मूझे, मत रख मौन।

Topic(s) of this poem: love


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Poem Submitted: Tuesday, March 21, 2017



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