वो दिन जब सब हुआ तार-तार......

मैं जब छोटी थी, वो मेरा भाई था ।
मैं जब बड़ी हुई तब भी वो मेरा भाई था ।
ना जाने क्यों वो मुझे हवस से देखता था ।
मुझे देख वो अपनी आंखे सेकता था ।
मेरे शरीर में बदलाव आ रहे थे,
उसके में क्या पता क्या ख्याल आ रहे थे ।
वो दिन आज भी याद करती हूं, जब घर में शादी का जश्न था ।
मैं घर में अकेली और मेरा भाई नशे में मग्न था ।
उसने मुझसे पानी बुलवाया, मैं लेकर गई ।
उसने मेरे शरीर को बहलाया, मैं सहम गई ।
उसका हाथ सहला रहा था वो बार-बार.....
वो दिन जब सब हुआ तार-तार...

मैं बता दूं, मैं बता दूं ये वहीं है ।
जो मुझे बचपन में लाड करता था,
ये वहीं है जो मुझे दुलार करता था,
इसने मेरा बस्ता भी उठाया है,
मेरे लिए लड़ा और सताया है,
ये वहीं है जिसे मैं बड़ी प्रेम से राखी बांधती थी ।
भाई दूज पर इसके लिए मन्नत मांगती थी ।
पर इसका वहीं चेहरा दिखता है बार-बार.....
वो दिन जब सब हुआ तार-तार...

मैं चुप रहती हूं, कि मेरे मां-बाप रोएंगे ।
भाई को सही और मुझे गलत कहेंगे ।
टूट जाएंगे वो ये बात सुनकर,
चुप रह; यह बात मत कहा कर,
अरे! मेरा दामन उस दिन छलनी हुआ,
मेरी रूह उस दिन कांपी ।
मै थरथरा गई थी उस दिन जब यह कृत्य हुआ,
कब तक चुप इस बात को, यह तो सत्य हुआ ।
उस दिन भाई का रिश्ता हुआ झार-झार
वो दिन जब सब हुआ तार-तार...

- राहुल व्यास

Thursday, November 23, 2017
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यह सत्य घटना पर आधारित कविता है |
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