मैं हूँ प्राण वायु
निराकार, निर्विकल्प जीवन का आधार हूँ मैं
जीवित आत्मा का, अन्तहीन स्वरूप हूँ मैं ।
प्रेम और मुत्ति का प्रतीकात्मक पहिचान हूँ मैं
तुम्हारा गंतब्य के लिए सबल पंख हूँ मैं ।
पंच महाभूतों में से एक अग्रणी हूँ मैं
ब्रह्माण्ड रचना का आधारशीला हूँ मैं ।
सुर और ताल का मूल प्रवाह हूँ मैं
स्वर और संगीत का संगम हूँ मैं ।
ना मेरा कोई कौम हैं, ना कोई मज़हब
समानता, निष्पक्ष का प्रतीक हूँ मैं ।
गोरे काले, , औरत मर्द, हिंन्दू, मुसलमान और इशाई
भेदभाव मैने ना कभी कि, मेरे लिए सब समान ।
जहाँ मेैं ना हू, थम जाता जीवन का अस्तित्व
पेड झुलते नहीं, फूल खिलते नहीं, खुशबू के लिए ।
मुझ बीन मेघ बरसते नहीं, खुड से उनको भरोसा नहीं
निश्चय मैं प्राण वायू, समस्त जगत का जीवन-आधार ।
रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
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सुर और ताल का मूल प्रवाह हूँ मैं स्वर और संगीत का संगम हूँ मैं । ना मेरा कोई कौम हैं, ना कोई मज़हब समानता, निष्पक्ष का प्रतीक हूँ मैं । Excellent poem dear poet. Enjoyed going through it. 10+ for the nice poem.